दुनिया की शुरूआत

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दुनिया की शुरूआत

हमारे पास जितनी भी अच्छी चीज़ें हैं, वे सब हमें परमेश्वर ने दी हैं। उसने हमें दिन में रोशनी देने के लिए सूरज बनाया। और रात में थोड़ी-बहुत रोशनी देने के लिए चाँद-तारे बनाए। और हाँ, हमारे रहने के लिए धरती भी बनायी।

लेकिन परमेश्वर ने सूरज, चाँद-तारे और धरती बनाने से पहले और भी किसी को बनाया था। मालूम है किसे? स्वर्गदूतों को। मगर जैसे हम परमेश्वर को नहीं देख सकते, वैसे ही हम स्वर्गदूतों को नहीं देख सकते। परमेश्वर ने उन्हें इसलिए बनाया, ताकि वे उसके साथ स्वर्ग में रह सकें।

जिस स्वर्गदूत को सबसे पहले बनाया गया, उसे परमेश्वर का बेटा कहा गया। परमेश्वर अपने बेटे से बहुत प्यार करता था। वह पहला स्वर्गदूत अपने पिता, परमेश्वर के साथ काम करता था। उसने बाकी सभी चीज़ें बनाने में अपने पिता की मदद की। यहाँ तक कि सूरज, चाँद-तारे और हमारी धरती को बनाने में भी।

पता है शुरू में धरती कैसी थी? उस समय पूरी धरती पर सिर्फ पानी-ही-पानी था और चारों तरफ अंधेरा छाया हुआ था। इसलिए धरती पर कोई नहीं रह सकता था। मगर परमेश्वर चाहता था कि धरती पर इंसान रहें। इसलिए हमारे रहने के लिए उसने तैयारी करनी शुरू की। जानते हैं उसने क्या-क्या किया?

सबसे पहले, धरती पर रोशनी की ज़रूरत थी। इसलिए परमेश्वर ने धरती पर सूरज की रोशनी चमकायी। उसके बाद धरती पर दिन और रात दोनों होने लगे। फिर परमेश्वर ने कुछ ऐसा किया, जिससे सूखी ज़मीन पानी के ऊपर आ गयी।

उस समय ज़मीन पर कुछ भी नहीं था। न फूल, न पेड़, न जानवर। समुंदर में मछलियाँ भी नहीं थीं। उस वक्‍त धरती यहाँ दी तसवीर जैसी ही दिखती थी। अभी परमेश्वर को धरती पर बहुत काम करना था, ताकि इस पर इंसान और जानवर रह सकें।

यिर्मयाह 10:12; कुलुस्सियों 1:15-17; उत्पत्ति 1:1-10.

यिर्मयाह 10:12
[12]उसी ने पृथ्वी को अपनी सामर्थ से बनाया, उसने जगत को अपनी बुद्धि से स्थिर किया, और आकाश को अपनी प्रवीणता से तान दिया है।

कुलुस्सियों 1:15-17
[15]वह तो अदृश्य परमेश्वर का प्रतिरूप और सारी सृष्टि में पहिलौठा है।
[16]क्योंकि उसी में सारी वस्तुओं की सृष्टि हुई, स्वर्ग की हो अथवा पृथ्वी की, देखी या अनदेखी, क्या सिंहासन, क्या प्रभुतांए, क्या प्रधानताएं, क्या अधिकार, सारी वस्तुएं उसी के द्वारा और उसी के लिये सृजी गई हैं।
[17]और वही सब वस्तुओं में प्रथम है, और सब वस्तुएं उसी में स्थिर रहती हैं।

उत्पत्ति 1:1-10
[1]आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।
[2]और पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी; और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था: तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था।
[3]तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया।
[4]और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया।
[5]और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहिला दिन हो गया॥
[6]फिर परमेश्वर ने कहा, जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।
[7]तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।
[8]और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया॥
[9]फिर परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे; और वैसा ही हो गया।
[10]और परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा; तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।

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