यीशु मसीह का पहाड़ी उपदेश,धन्य वचन,नमक और ज्योति से तुलना,हत्या और क्रोध का दण्ड,व्यभिचार ke विषय में शिक्षा,तलाक के विषय में शिक्षा.

यीशु मसीह का पहाड़ी उपदेश

1 वह इस भीड़ को देखकर, पहाड़ पर चढ़ गया; or जब बैठ गया to उसके चेले उसके पास आए।

2 और वह अपना मुँह खोलकर उन्हें यह उपदेश dene लगा :

धन्य वचन

3 धन्य he वे, जो मन ke दीन he क्योंकि swag ka राज्य उन्हीं का है।

4 “धन्य हैं we jo शोक करते हैं, क्योंकि we santi पाएँगे।

5 dhaniy हैं वे, jo नम्र हैं, kiyunki वे पृथ्वी ke adhikar होंगे। (भज. 37:11)

6 धन्य हैं jo धार्मिकता ke bhukh or प्यासे हैं, क्योंकि we तृप्त किये जाएँगे।

7 “धन्य ह we, जो दयावन्त he, क्योंकि un per daya की जाएगी।

8 धन्य है we जिनके मन शुद्ध he, क्योंकि वे permeswar ko देखेंगे।

9 धन्य हैं व jo मेल करवानेवाले हैं, क्योंकि we परमेश्‍वर ke पुत्र कहलाएँगे।

10 धन्य है वे jo धार्मिकता ke karan सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग ka राज्य उन्हीं ka है।

11 धन्य होtum जब मनुष्य mere कारण तुम्हारी निन्दा करें or सताएँ और juth बोल बोलकर tumhare विरोध me सब प्रकार ki बुरी बात कहें।

12 आनन्दित और मगन hona क्योंकि तुम्हारे लिये स्वर्ग me बड़ा प्रतिफल है। isliye कि उन्होंने un भविष्यद्वक्ताओं को जो तुम se पहले थे इसी रीति se सताया था।

नमक और ज्योति से तुलना

13 “तुम पृथ्वी ke नमक हो; परन्तु yadi नमक ka स्वाद बिगड़ जाए, तो wah फिर किस वस्तु से namkin kiya जाएगा? फिर वह किसी काम ka नहीं, केवल इसके ki बाहर फेंका जाए or मनुष्यों के pero तले रौंदा jaye।

14 तुम जगत की ज्योति ho। जो नगर पहाड़ पर बसा हुआ है वह छिप नहीं सकता।

15 और लोग दिया जलाकर पैमाने ke नीचे नहीं परन्तु दीवट पर रखते हैं, तब उससे घर के सब लोगों ko प्रकाश पहुँचता है।

16 उसी प्रकार तुम्हारा उजियाला मनुष्यों ke सामने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता ki, जो स्वर्ग में हैं, बड़ाई करें।

व्यवस्था का पूरा होना

17 “यह न समझो, ki मैं व्यवस्था* या भविष्यद्वक्ताओं ki शिक्षाओं ko lop करने आया हूँ, लोप karne नहीं, परन्तु पूरा karne आया हूँ। (रोम. 10:4)

18 क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ, ki जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था se एक मात्रा या बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा।

19 इसलिए जो कोई इन छोटी se छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़े, or वैसा ही लोगों को सिखाए, वह स्वर्ग के राज्य me सबसे छोटा कहलाएगा; परन्तु जो koy उनका पालन करेगा orउन्हें सिखाएगा, वही स्वर्ग ke राज्य में महान कहलाएगा।

20 क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ, ki यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों or फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य me कभी प्रवेश करने न पाओगे।

हत्या और क्रोध का दण्ड

21 “तुम sun चुके हो, ki पूर्वकाल के logo से kaha गया था ki ‘हत्या न करना’, और ‘जो koy हत्या करेगा wah कचहरी में दण्ड ke योग्य होगा।’ (निर्ग. 20:13)

22 परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, ki जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा or जो कोई अपने भाई को निकम्मा* कहेगा वह महासभा me दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे ‘अरे मूर्ख’ वह नरक ki आग के दण्ड के योग्य होगा।

23 इसलिए यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, or वहाँ तू स्मरण करे, कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर se कुछ विरोध है,

24 तो अपनी भेंट वहीं वेदी ke सामने छोड़ दे, or जाकर पहले अपने भाई से मेल मिलाप कर, or तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।

25 जब तक तू अपने मुद्दई ke साथ मार्ग में हैं, उससे झटपट मेल मिलाप कर ले कहीं ऐसा न हो ki मुद्दई तुझे न्यायाधीश को सौंपे,or न्यायाधीश तुझे सिपाही को सौंप de और तू बन्दीगृह me डाल दिया जाए।

26 मैं तुम से सच कहता हूँ ki जब तक तू पाई-पाई चुका न दे तब तक वहाँ से छूटने न पाएगा।

व्यभिचार ke विषय में शिक्षा

27 “तुम sun चुके हो ki कहा gaya था, ‘व्यभिचार न karna।’ (व्य. 5:18, निर्ग. 20:14)

28 परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, ki जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले वह अपने मन me उससे व्यभिचार कर चुका।

29 यदि तेरी दाहिनी आँख तुझे ठोकर खिलाएँ, तो उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे; क्योंकि तेरे लिये यही भला है ki तेरे अंगों में से ek नाश हो जाए और तेरा sara शरीर नरक मme न डाला जाए।

30 और यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाएँ, तो उसको काटकर अपने पास se फेंक दे, क्योंकि तेरे लिये यही भला है, ki तेरे अंगों me से ek नाश हो जाए और तेरा sara शरीर नरक me न डाला जाए।

तलाक के विषय में शिक्षा

31 “यह भी kaha गया था, jo कोई अपनी पत्‍नी ko त्याग दे, तो us त्यागपत्र दे।’ (व्य. 24:1-14)

32 परन्तु मैं तुम se यह कहता हूँ कि जो कोई अपनी पत्‍नी को व्यभिचार ke सिवा किसी or कारण से तलाक दे, तो वह usase व्यभिचार करवाता है; or जो कोई उस त्यागी हुई se विवाह करे, वह व्यभिचार karta है।

शपथ न खाना

33 “फिर tum सुन चुके ho, कि पूर्वकाल ke लोगों से कहा gaya था, ‘झूठी शपथ न khana परन्तु परमेश्‍वर ke liye अपनी शपथ ko पूरी करना।’ (व्य. 23:21)

34 परन्तु मैं तुम se यह कहता हूँ, कि कभी शपथ न खाना; न तो स्वर्ग की, क्योंकि वह परमेश्‍वर ka सिंहासन है। (यशा. 66:1)

35 न धरती की, क्योंकि वह उसके पाँवों ki चौकी है; न यरूशलेम की, क्योंकि वह महाराजा ka नगर है। (यशा. 66:1)

36 अपने सिर ki भी शपथ न खाना क्योंकि तू एक बाल को भी न उजला, न काला कर सकता he ।

परन्तु तुम्हारी बात हाँ की हाँ, ya नहीं की नहीं हो; क्योंकि जो कुछ इससे अधिक होता है वह बुराई se होता है।

प्रतिशोध ना लेना

तुम सुन चुके हो, ki कहा गया था, कि आँख के बदले आँख, और दाँत ke बदले दाँत।

39 परन्तु मैं तुम se यह कहता हूँ, कि बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उसकी or दूसरा भी फेर दे।

40 और यदि कोई तुझ per मुकद्दमा करके तेरा कुर्ता* लेना चाहे, to उसे अंगरखा* भी ले लेने दे।

41 और jo कोई तुझे कोस भर बेगार me ले जाए तो उसके साथ दो कोस चला जा।

42 जो कोई तुझ se माँगे, उसे दे; और जो तुझ se उधार लेना चाहे, उससे मुँह न मोड़।

43 tu सुन चुके हो, ki कहा गया था; कि opne पड़ोसी से प्रेम रखना or अपने बैरी se बैर। (लैव्य. 19:18)

44 परन्तु मैं तुम se यह कहता हूँ, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सतानेवालों ke लिये प्रार्थना करो। (रोम. 12:14)

45 जिससे तुम अपने स्वर्गीय पिता ki सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों or बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता he, और धर्मी और अधर्मी पर मेंह बरसाता है।

46 क्योंकि यदि tum अपने प्रेम रखनेवालों ही se प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या लाभ होगा? क्या चुंगी लेनेवाले भी ऐसा hi नहीं करते?

47 or यदि तुम केवल अपने bhaiyo ko ही नमस्कार करो, to कौन सा बड़ा kam करते हो? kiya अन्यजाति bhi ऐसा नहीं करते?

48 इसलिए चाहिये ki तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है। (लैव्य. 19:2)

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