दिवाली 2019,दीपावली का इतिहास.

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दिवाली 2019
रविवार 27 अक्टूबर 2019

धनतेरस शुक्रवार 25 अक्टूबर 2019

नरक चतुर्दशी (छोटी दीवाली) शनिवार 26 अक्टूबर 2019

लक्ष्मी पूजा (मुख्य दिवाली) रविवार 27 अक्टूबर 2019

बाली प्रतिप्रदा ya गोवर्धन पूजा सोमवार 28 अक्टूबर 2019

यम द्वितीय ya भाईदूज मंगलवार 29 अक्टूबर 2019

दीपावली का इतिहास से जुड़ी बातें.

दीपोत्सव ka वर्णन प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। दीपावली से जुड़े कुछ रोचक तथ्य हैं

jo इतिहास के पन्नों में apna विशेष स्थान बना चुके हैं इस पर्व ka अपना ऐतिहसिक महत्व bhi है

जिस कारण यह त्योहार किसी खास समूह ka न होकर संपूर्ण राष्ट्र का हो गया है

धर्म ke दृष्टि से दीपावली के त्योहार ka ऐतिहासिक महत्व है अनेक धर्मग्रंथ दीपावली ka ऐतिहासिक mahatav हमें बतलाते हैं।

आइए जानते है दीपावली se जुड़े धार्मिक तथ्य.

विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों ko नाप लिया। राजा बलि की दानशीलता

से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक ka

राज्य दे दिया साथ ही यह भी आश्वासन diya ki उनकी याद में भू लोकवासी प्रत्येक वर्ष दीपावली मनाएंगे।


महाप्रतापी तथा दानवीर राजा बलि ने अपने बाहुबल se तीनों लोकों पर

विजय प्राप्त कर ली तब बलि से भयभीत देवताओं ki

प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर प्रतापी राजा बलि से

तीन पग पृथ्वी दान ke रूप में मांगी।

महाप्रतापी राजा बलि ने भगवान विष्णु की चालाकी ko समझते हुए भी

याचक ko निराश नहीं किया और तीन पग पृथ्वी दान में दे दी

त्रेतायुग में भगवान राम जब रावण ko हराकर अयोध्या वापस लौटे तब

unke आगमन पर दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया or खुशियां मनाई गईं

कार्तिक अमावस्या के दिन सिखों ke छठे गुरु हरगोविन्दसिंहजी बादशाह जहांगीर की कैद se मुक्त होकर अमृतसर वापस लौटे थे।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध ke समर्थकों एवं अनुयायियों ने

2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध ke स्वागत में हजारों-लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी।

कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर ka वध दीपावली के ek दिन पहले चतुर्दशी को किया था।

इसी खुशी me अगले दिन अमावस्या ko गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं।
500 ईसा वर्ष पूर्व ki मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की ek मूर्ति के

अनुसार us समय भी दीपावली मनाई जाती थी।

उस मूर्ति में मातृ-देवी ke दोनों or दीप जलते दिखाई देते हैं।

अमृतसर ke स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी दीपावली ke ही दिन शुरू हुआ था

जैन धर्म ke चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी दीपावली ke दिन ही

बिहार के पावापुरी me अपना शरीर त्याग दिया। महावीर निर्वाण संवत्‌ iske दूसरे दिन से शुरू होता है।

इसलिए अनेक प्रांतों में इसे वर्ष के आरंभ ki शुरुआत मानते हैं।

यह भी कथा प्रचलित है ki जब श्रीकृष्ण ने आतताई नरकासुर जैसे दुष्ट ka वध किया तब

ब्रजवासियों ने अपनी प्रसन्नता दीपों ko जलाकर प्रकट की।

राक्षसों का वध करने ke लिए मां देवी ने महाकाली का रूप धारण किया।

राक्षसों का वध करने ke बाद भी जब महाकाली का क्रोध kam नहीं हुआ तब

भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव ke

शरीर स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली ka क्रोध समाप्त हो गया। इसी ki याद में उनके

शांत रूप लक्ष्मी की पूजा ki शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्ररूप काली ki पूजा का भी विधान है।
मुगल वंश ke अंतिम सम्राट बहादुर शाह जफर दीपावली को त्योहार ke

रूप में मनाते थे ir इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में भाग लेते थे।

शाह आलम द्वितीय ke समय में समूचे शाही महल को दीपों से सजाया जाता था एवं

लाल किले me आयोजित कार्यक्रमों में हिन्दू-मुसलमान दोनों भाग लेते थे।

पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ ka जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली ke दिन ही हुआ।

इन्होंने दीपावली के दिन गंगातट par स्नान करते समय ‘ओम’ कहते हुए समाधि ले ली।
महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति ke महान जननायक बनकर दीपावली ke दिन

अजमेर ke निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की

दीन-ए-इलाही ke प्रवर्तक मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल me दौलतखाने

के सामने 40 गज ऊंचे बांस पर ek बड़ा आकाशदीप दीपावली ke दिन लटकाया जाता था।

बादशाह जहाँगीर भी दीपावली धूमधाम से मनाते थे

सम्राट विक्रमादित्य ka राज्याभिषेक दीपावली ke दिन हुआ था. इसलिए दीप जलाकर खुशियां मनाई गईं।
ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र ke अनुसार कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों or

घाटों (नदी के किनारे) par बड़े पैमाने पर दीप जलाए जाते थे।

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