जो मुझे सामर्थ देता है, उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।

“जो मुझे सामर्थ देता है, उसमें मैं सब कुछ कर सकता हूँ।” (फिलिप्पियों ४:१३)

   पुनरूत्थान के बाद प्रभु ने याकूब को दर्शन दिया (१ कुरिन्थियों १५: ७)।
याकूब मुख्य प्रेरितों में से एक था और शंकास्पद बातों में याकूब की सलाह ली जाती थी।
पतरस को जब कैदखाने में से दूत के द्वारा छुटकारा मिला तब
वह यूहन्ना मरकुस की माता मरियम के घर गया। वहाँ प्रभु उसे
किस रीति से कैदखाने से बाहर लाया उसे वह उन्हें कह सुनाया,
और कहा, ‘यह समाचार याकूब और दूसरे भाइयों को पहुँचाना।
उसके बाद वह दूसरी जगह चला गया’ (प्रे के काम १२:१७)।
और प्रे के काम १५:१३, १४ में हम आगे पढ़ते हैं कि ‘जब वे चुप हुए,
तो याकूब कहने लगा कि, हे भाइयों, मेरी सुनों।’ इन दो संदर्भों पर से यह स्पष्ट होता है कि जब
- जब किसी विषय पर सलाह या अंतिम निर्णय की जरुरत पड़ती तब
- तब याकूब को पूछा जाता था। इस आनेवाली बड़ी आत्मिक जिम्मेदारी के लिये याकूब को
तैयार करने के लिये प्रभु ने उसे दर्शन दिया। परमेश्वर के घर में जिन्हें अधिक जिम्मेदारी उठानी होती है,
उनको परमेश्वर अधिक शक्ति और अनुग्रह देता है। बहुतेरे विश्वासी कुछ प्राप्त करने के लिये ही सभाओं में जाते हैं
और उनको संदेशों और गीतों की ही चिन्ता होती है। परन्तु परमेश्वर के घर को बनाने में,
उनका हिस्सा क्या है इसे वे खोजते नहीं है। दूसरों की सेवा करने में,
परमेश्वर की महिमा के लिये सुसंदेश प्रचार करने में और परमेश्वर की मण्डली बनाने में बड़ी
जिम्मेदारी को उठाने के लिये हम जैसे जैसे अधिक तत्पर होते हैं वैसे - वैसे पुनरूत्थान के
सामर्थ्य को हम अधिक रीति से अनुभव कर सकेंगे। इसी कारण से पौलुस कहता है,
‘मैं... सब बातों को हानि समझता हूँ जिसके कारण मैं उसको और उसके मृत्युनजय की सामर्थ को जानूँ।’

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