नूह का जहाज़

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नूह का जहाज़

नूह की एक बीवी और तीन बेटे थे। उसके बेटों के नाम थे, शेम, हाम और येपेत। नूह के तीनों बेटों की एक-एक बीवी थी। कुल मिलाकर नूह के परिवार में आठ लोग थे।

परमेश्वर ने नूह को अब एक काम दिया, जो बहुत अजीब था। वह क्या? परमेश्वर ने नूह से एक बहुत बड़ा पानी का जहाज़ बनाने को कहा। वह जहाज़ दिखने में एक बड़े और लंबे बक्से जैसा होता। परमेश्वर ने नूह से कहा, ‘जहाज़ में तीन मंज़िल बनाना और हर मंज़िल में अलग-अलग कमरे बनाना।’ आखिर ये कमरे किस लिए थे? कुछ कमरों में नूह और उसका परिवार रहता, तो कुछ में जानवर रखे जाते। और बाकी कमरों में सबके लिए ढेर सारा खाना रखा जाता। परमेश्वर ने नूह को यह भी बताया कि वह जहाज़ को अंदर और बाहर से राल या डामर से पोत दे, ताकि पानी जहाज़ के अंदर न जा सके। परमेश्वर ने नूह से कहा: ‘मैं पूरी धरती पर बाढ़ लाऊँगा और धरती से हर चीज़ मिटा दूँगा। मैं इतना पानी बरसाऊँगा कि सबकुछ डूब जाएगा! सिर्फ वही बचेगा, जो जहाज़ के अंदर होगा।’

नूह और उसके बेटों ने यहोवा की बात मानी और जहाज़ बनाने के काम में जुट गए। मगर दूसरे लोग उन पर हँसने लगे। उन्होंने बुरे काम करना बंद नहीं किया। जब नूह ने उन्हें बताया कि परमेश्वर सारी धरती पर बाढ़ लाकर सबको खत्म करने जा रहा है, तो किसी ने भी नूह की बात सच नहीं मानी।

नूह और उसके परिवार को बहुत बड़ा जहाज़ बनाना था। इसलिए इस काम में उन्हें कई साल लग गए। आखिर में जब जहाज़ बनकर तैयार हो गया, तो परमेश्वर ने नूह से कहा कि वह कुछ जानवरों में से दो-दो, यानी एक नर और एक मादा को जहाज़ के अंदर ले जाए। और बाकी जानवरों में से सात-सात ले जाए। परमेश्वर ने नूह को सब किस्म की चिड़ियों को भी जहाज़ के अंदर ले जाने को कहा। परमेश्वर ने जैसा कहा था, नूह ने ठीक वैसा ही किया।

यह सब करने के बाद, नूह और उसका परिवार भी जहाज़ के अंदर चला गया। फिर परमेश्वर ने जहाज़ का दरवाज़ा बंद कर दिया। अब नूह और उसका परिवार जहाज़ के अंदर इंतज़ार करने लगा कि कब बाढ़ आएगी। सोचिए, आप भी उनके साथ जहाज़ में बैठे इंतज़ार कर रहे हैं। क्या परमेश्वर की बात सच निकलेगी?

उत्पत्ति 6:9-22; 7:1-9.

उत्पत्ति 6:9-22
[9]नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरूष और अपने समय के लोगों में खरा था, और नूह परमेश्वर ही के साथ साथ चलता रहा।
[10]और नूह से, शेम, और हाम, और येपेत नाम, तीन पुत्र उत्पन्न हुए।
[11]उस समय पृथ्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई थी, और उपद्रव से भर गई थी।
[12]और परमेश्वर ने पृथ्वी पर जो दृष्टि की तो क्या देखा, कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियों ने पृथ्वी पर अपनी अपनी चाल चलन बिगाड़ ली थी।
[13]तब परमेश्वर ने नूह से कहा, सब प्राणियों के अन्त करने का प्रश्न मेरे साम्हने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृथ्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिये मैं उन को पृथ्वी समेत नाश कर डालूंगा।
[14]इसलिये तू गोपेर वृक्ष की लकड़ी का एक जहाज बना ले, उस में कोठरियां बनाना, और भीतर बाहर उस पर राल लगाना।
[15]और इस ढंग से उसको बनाना: जहाज की लम्बाई तीन सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊंचाई तीस हाथ की हो।
[16]जहाज में एक खिड़की बनाना, और इसके एक हाथ ऊपर से उसकी छत बनाना, और जहाज की एक अलंग में एक द्वार रखना, और जहाज में पहिला, दूसरा, तीसरा खण्ड बनाना।
[17]और सुन, मैं आप पृथ्वी पर जलप्रलय करके सब प्राणियों को, जिन में जीवन की आत्मा है, आकाश के नीचे से नाश करने पर हूं: और सब जो पृथ्वी पर हैं मर जाएंगे।
[18]परन्तु तेरे संग मैं वाचा बान्धता हूं: इसलिये तू अपने पुत्रों, स्त्री, और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना।
[19]और सब जीवित प्राणियों में से, तू एक एक जाति के दो दो, अर्थात एक नर और एक मादा जहाज में ले जा कर, अपने साथ जीवित रखना।
[20]एक एक जाति के पक्षी, और एक एक जाति के पशु, और एक एक जाति के भूमि पर रेंगने वाले, सब में से दो दो तेरे पास आएंगे, कि तू उन को जीवित रखे।
[21]और भांति भांति का भोज्य पदार्थ जो खाया जाता है, उन को तू ले कर अपने पास इकट्ठा कर रखना सो तेरे और उनके भोजन के लिये होगा।
[22]परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।

उत्पत्ति 7:1-9
[1]और यहोवा ने नूह से कहा, तू अपने सारे घराने समेत जहाज में जा; क्योंकि मैं ने इस समय के लोगों में से केवल तुझी को अपनी दृष्टि में धर्मी देखा है।
[2]सब जाति के शुद्ध पशुओं में से तो तू सात सात, अर्थात नर और मादा लेना: पर जो पशु शुद्ध नहीं है, उन में से दो दो लेना, अर्थात नर और मादा:
[3]और आकाश के पक्षियों में से भी, सात सात, अर्थात नर और मादा लेना: कि उनका वंश बचकर सारी पृथ्वी के ऊपर बना रहे।
[4]क्योंकि अब सात दिन और बीतने पर मैं पृथ्वी पर चालीस दिन और चालीस रात तक जल बरसाता रहूंगा; जितनी वस्तुएं मैं ने बनाईं हैं सब को भूमि के ऊपर से मिटा दूंगा।
[5]यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।
[6]नूह की अवस्था छ: सौ वर्ष की थी, जब जलप्रलय पृथ्वी पर आया।
[7]नूह अपने पुत्रों, पत्नी और बहुओं समेत, जलप्रलय से बचने के लिये जहाज में गया।
[8]और शुद्ध, और अशुद्ध दोनो प्रकार के पशुओं में से, पक्षियों,
[9]और भूमि पर रेंगने वालों में से भी, दो दो, अर्थात नर और मादा, जहाज में नूह के पास गए, जिस प्रकार परमेश्वर ने नूह को आज्ञा दी थी।

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